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posted on : April 26, 2026 7:40 pm

गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहरों में रम्माण मेला एक अद्वितीय पहचान रखता है। चमोली जिले के सलूड-डुंग्रा गांव में आयोजित इस मेले ने एक बार फिर लोक परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया।

रामायण की मूल कथा पर आधारित मुखौटा शैली का यह लोकनाट्य न केवल धार्मिक भावनाओं को जीवंत करता है, बल्कि स्थानीय शिल्प और संगीत परंपरा को भी संरक्षित करता है। भोजपत्र से निर्मित 18 मुखौटे, 12 ढोल, 12 दमाऊ, 18 ताल और आठ भंकोरों की थाप ने वातावरण को भक्तिमय ऊर्जा से भर दिया। राम जन्म, वनगमन, स्वर्ण मृग वध, सीता हरण और लंका दहन जैसे प्रसंगों का सजीव मंचन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इस आयोजन में बदरीनाथ के विधायक लखपत बुटोला, जिलाधिकारी गौरव कुमार और पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह पंवार समेत अन्य जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। आयोजन समिति के संयोजक डा. कुशल सिंह भंडारी और सचिव भरत सिंह कुंवर ने स्मृति चिह्न देकर अतिथियों का स्वागत किया।

गौरतलब है कि वर्ष 2009 में यूनेस्को की ओर से विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित रम्माण मेला भूम्याल देवता को समर्पित है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि लोक संस्कृति के संरक्षण का जीवंत उदाहरण है।

रम्माण मेला यह संदेश देता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी यदि परंपरा और संस्कृति को संजोया जाए, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर बन सकती है।

इस दौरान दायित्वधारी हरक सिंह नेगी, ब्लाॅक प्रमुख अनूप नेगी, पालिकाध्यक्ष देवेश्वरी शाह, आईटीबीपी औली के महानिरीक्षक अखिलेख रावत, आईटीबीपी के कमांडेंट रतन सिंह सोनाल, पूर्व धर्माधिकारी भुवन चन्द्र उनियाल समिति के अध्यक्ष शरद सिंह बंगारी, उपाध्यक्ष गोविन्द सिंह पंवार, विकेश कुंवर, रघुवीर सिंह, डुंग्रा की रीना कुंवर, सलूड की प्रधान सुनीता देवी, क्षेपंस दमयंती देवी आदि मौजूद रहे।

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