गोपेश्वर (चमोली)। वामपंथी दलों ने भाजपा सरकार की ओर से मनरेगा का नाम बदल कर वीबी-जी-राम-जी किए जाने का विरोध करते हुए जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में धरना देते हुए एक ज्ञापन राष्ट्रपति को भेजकर वीबी-जी-राम-जी बिल को वापस लिए जाने की मांग की है।
वामपंथी पार्टियों के देशव्यापी विरोध दिवस के तहत सोमवार को केन्द्र की मोदी सरकार की ओर से मनरेगा कानून के स्थान पर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून पारित किये जाने के विरोध में जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में धरना दिया। सीपीएम के जिला मंत्री मदन मिश्रा, सीपीआई के जिला मंत्री भरत सिंह कुंवर का कहना था कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के बुनियादी चरित्र को बदलने के लिये भाजपा के नेतृत्ववाली केन्द्र सरकार की ओर से मनरेगा के स्थान पर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून 2025 (वीबी-जी-राम-जी) को पारित किये जाने का वामपंथी दल कड़ा विरोध करते है। कहा कि मनरेगा एक सार्वभौम मांग संचालित कानून है, जो भले ही काम का एक सीमित अधिकार मुहैया कराता है लेकिन नया कानून इसके चरित्र को ही बदल देता है और लागों को इस न्यूनतम अधिकार तक से वंचित कर रहा है। यह नया कानून केन्द्र सरकार को मांग के अनुसार फंड आवंटित्त करने की अपनी जिम्मेदारी से ही कानूनी तौर पर बरी कर देता है।
वाम नेताओं ने आरोप लगाते हुए कहा कि गारंटीशुदा रोजगार 100 से बढ़कार 125 दिन करने का सरकार का दावा उसके जाने-माने जुमलों में से एक है। यह कानून जॉब कार्डो को युक्तियुक्त बनाने के नाम पर ग्रामीण परिवारों के बहुत बड़े हिस्सों को बाहर कर देता है। कृषि के काम के सबसे व्यस्त दिनों में 60 दिन के लिए इस रोजगार का निलंबित किया जाना, ग्रामीण परिवारों को जब काम की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उन्हें काम से वंचित कर देगा और उन्हें भूस्वामियों पर निर्भर बना देगा। अनिवार्य डिजिटल हाजिरी मजदूरों के लिए भारी मुश्किलें पैदा करती है। इसमें काम से हाथ धोना और अपने अधिकारों से वंचित किया जाना शामिल है। कहा कि इस नये कानून में फंडिंग के पैटर्न में किये गये बदलावों के जरिए केन्द्र सरकार ने अपनी जिम्मेदारी को राज्यों पर डाल दी है। राज्य सरकारों पर अवहनीय वित्तीय बोझ डालता है जबकि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में कोई भी भूमिका नहीं देता है। राज्यों से इसका भी तकाजा किया जा रहा है कि वे बेरोजगारी भत्ते व मजदूरी भुगतान में देरी का भी खर्चा उठाएं। इन तमाम बदलाओं का मकसद इस योजना की पहुंच को घटाना और केन्द्र सरकार की जवाबदेही को कम करना ही है।
उन्होंने सरकार से मांग की है कि भाजपा सरकार विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून 2025 को अविलम्ब वापस ले, मनरेगा को सार्वभौम बनाकर और कम से कम 200 दिन का रोजगार और 600 रूपया प्रतिदिन मजदूरी मुहैया कराना सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक फंड़ों का आवंटन कर मनरेगा को मजबूत करे।
धरना देने वालों में कमलेश गौड़, रघुवीर लाल कोहली, रोहित नेगी, भारत पुंडीर, नंदन सिंह नेगी, गजे सिंह बिष्ट, दयाल सिंह, भरत सिंह बर्त्वाल, भारतीय राणा, सरस्वती नेगी, उषा बिष्ट, महेशानंद जोशी, भरत सिंह बिष्ट, बस्ती लाल, प्रताप सिंह राणा, पवन कुमार, हीरा लाल, विनोद लाल, गीता बिष्ट के अलावा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी लेनिनवादी) लिबरेशन तीनों वामपंथी पार्टियों के पदाधिकारी व सदस्य धरने में शामिल रहे।
