गोपेश्वर (चमोली)। राज्य में सहकारिता के चुनाव अधर में लटक जाने के कारण अभी तक भी सहकारी संस्थाएं प्रशासकों के हवाले चल रही है। इसके चलते सहकारिता की नीव एक तरह से हिलने सी लग लग गई है। दरअसल उत्तराखंड में 2018 में सहकारिता के चुनाव हुए थे। इसके चलते दिसंबर 2023 तक सहकारी संस्थाएं अध्यक्षों अथवा सभापतियों के माध्यम से संचालित होती रही। कार्यकाल निपटने के पश्चात सहकारी संस्थाओं को प्रशासकों के हवाले कर दिया गया। सहकारिता चुनावों को लेकर लगातार गतिरोध बना रहा। इसके चलते चुनाव न होने से प्रशासक ही सहकारी संस्थाओं के खैवनहार बने रहे। पिछले साल 2025 में राज्य में प्रारंभिक साधन सहकारी समितियों के चुनाव हुए। इसके चलते अधिसंख्य समितियों में जनप्रतिनिधि, सभापति अथवा अध्यक्ष पद पर आसीन हो गए। इसके बावजूद हरिद्वार तथा ऊधमसिंह नगर में सहकारी समितियों के चुनाव न होने के कारण शीर्षस्थ समितियों का चुनाव भी लटका पड़ा है। अब नवंबर में इन दोनों जनपदों की समितियों का चुनाव तो हो गया किंतु अभी अन्य सहकारी समितियों का चुनाव होना बाकी है। अन्य सहकारी समितियों के चुनाव होने के बाद ही जनपदस्तरीय शीर्षस्थ समितियों का चुनाव हो पाएगा। इसके बाद राज्यस्तरीय समितियों के चुनाव की कवायद हो पाएगी।
चमोली जिले में तो जनपदस्तरीय डीसीडीएफ, भेषज सहकारी संघ, सीमांत विकास संघ तथा यातायात संघ के चुनाव होने हैं। इन संस्थाओं के चुनाव होने के बाद ही जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव होगा। जिला सहकारी बैंक के चुनाव होने के बाद ही राज्यस्तरीय संस्थाओं को प्रतिनिधि भेजे जाएंगे। राज्यस्तर पर इफ्को, क्रिफ्को, राज्य सहकारी संघ, राज्य सहकारी बैंक समेत राज्यस्तरीय अन्य शीर्षस्थ सहकारी संस्थाओं के चुनाव संपादित हो सकेंगे। वैसे इन चुनावों को 2023 के दिसंबर बाद किया जाना था किंतु दो साल से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद सहकारी संस्थाओं के चुनाव अधर में लटके पड़े हैं। सहकारी संस्थाओं के चुनाव के अधर में लटक जाने के कारण सहकारिता की मूल भावना को पलीता लग रहा है। इसके चलते सहकारी संस्थाएं सरकारी अधिकारियों के जरिए संचालित हो रही हैं। कहा जा सकता है कि दो साल से अधिक समय से सरकारी अधिकारी ही प्रशासक के रूप में कुर्सियों पर काबिज हैं। इस मामले में देरी को लेकर अपने-अपने हिसाब से कयासबाजी कर रहे हैं। अब भी माना जा रहा है कि जिलास्तरीय संस्थाओं से लेकर राज्यस्तरीय संस्थाओं के चुनाव होने में पांच-छह माह लग जाएंगे। इस तरह सहकारिता के चुनावों को लेकर असमजस के हालात बनने से तमाम दावेदार भी हैरान परेशान होकर रह गए हैं। अब देखना यह है कि सहकारी संस्थाओं के चुनाव को लेकर सरकार किस तरह फुर्ती में आती है। इस पर ही सहकारी संस्थाओं के चुनावों का भविष्य निर्भर करेगा।
