देवभूमि उत्तराखंड - वित्तीय प्रबंधन में श्रेष्ठ प्रदर्शन
शेयर करें !
posted on : September 18, 2026 4:10 pm

-चैसिंघा मेंढ़े की अगुवाई में पातर नौचयनिया पहुंची बड़ी जात,

-चटक धूप में खिले श्रद्धालुओं के चेहरे

-बुग्यालों में खिले ब्रह्मकमल ने बढ़ाई यात्रा की आभा

गोपेश्वर (चमोली)। बारह बरस से जिस पल का इंतजार था, वह शुक्रवार को फिर आया। हिमालय के निर्जन पड़ाव मां नंदा के जयकारों से गूंज उठे। चैसिंघा मेंढ़े की अगुवाई में मां नंदा की बड़ी जात वेदनी कुंड में पूजा-अर्चना के बाद कैलुवा विनायक होते हुए पातर नौचयनिया पहुंची। दशोली नंदा और बंड नंदा की डोलियों के साथ बंड भूमियाल, गेदाणु देवता समेत दर्जनों छंतोलियों और सैकड़ों श्रद्धालुओं के पहुंचते ही लंबे समय से पसरा हिमालय का सन्नाटा टूट गया।

 

बड़ी जात के इस पड़ाव पर शुक्रवार को मौसम भी मेहरबान रहा। पिछले दिनों की बारिश और खराब मौसम के बीच चटक धूप निकली तो दुर्गम रास्तों से पहुंचे श्रद्धालुओं के चेहरे खिल उठे। ऊंचाई वाले क्षेत्र में धूप ने ठंड और नमी से कुछ राहत दी तो श्रद्धालुओं के कदम भी उत्साह से आगे बढ़ते रहे। निर्जन पड़ावों में जगह-जगह मां नंदा और बंड भूमियाल के जयकारे सुनाई देते रहे।

वेदनी बुग्याल से पातर नौचयनिया तक का सफर बड़ी जात के लिए सिर्फ कठिन पहाड़ी रास्तों की यात्रा नहीं, बल्कि 12 साल में एक बार जीवंत होने वाली उस परंपरा का हिस्सा है, जिसमें आस्था के साथ पहाड़ की लोक संस्कृति भी हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचती है। डोलियों, छंतोलियों और देव निशानों के साथ चल रहे श्रद्धालु जागर और लोकगीत गाते हुए आगे बढ़ते रहे।

बारह साल बाद निर्जन हिमालयी पड़ावों में मां नंदा की डोली के पहुंचने से एक बार फिर पहाड़ की आस्था ने इन वीरान ऊंचाइयों को आबाद कर दिया है। जयकारों से गूंजता हिमालय और बुग्यालों में खिले ब्रह्मकमल बड़ी जात के इस सफर को यादगार बना रहे हैं।

 

अब शिला समुद्र की कठिन डगर

पातर नौचयनिया में रात्रि विश्राम के बाद बड़ी जात शनिवार को छेड़ी नाग, रूपकुंड ज्यूरां गौली और थाला उलारी होते हुए शिला समुद्र पहुंचेगी। इसके साथ ही यात्रा और अधिक दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में प्रवेश करेगी। ऊंचाई, बदलता मौसम और कठिन भूभाग के बीच श्रद्धालुओं की आस्था ही इस सफर की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है।

 

ब्रह्मकमल ने बढ़ाई हिमालय की खूबसूरती

बड़ी जात के रास्ते में इस बार ब्रह्मकमल की प्रचुरता भी श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही है। कैलुवा विनायक से भगुवावासा तक जगह-जगह खिले ब्रह्मकमल को देखकर श्रद्धालु अभिभूत हैं। पर्यावरण प्रेमी चंदन नयाल के अनुसार इस बार हिमालयी परिक्षेत्र में लंबे समय बाद इतनी बड़ी संख्या में ब्रह्मकमल खिले हैं। बंड मंदिर समिति के सचिव रघुनाथ सिंह फरस्वाण ने बताया कि मां नंदा की बड़ी जात और नंदाष्टमी समेत विभिन्न पर्वों में ब्रह्मकमल से मां नंदा की पूजा की परंपरा है। पंचकेदारों में भी इस पुष्प से भगवान शिव की पूजा की जाती है। बड़ी जात में ब्रह्मकमल को विशेष प्रसाद के रूप में भी श्रद्धा से ग्रहण किया जाता है।

 

पहली बार बड़ी जात में जेन-जी

इस बार बड़ी जात में नई पीढ़ी की भागीदारी भी खास आकर्षण है। पहली बार यात्रा में पहुंचे जेन-जी युवा मुकेश फरस्वाण, उपेंद्र बिष्ट और सुनील झिंकवाण वेदनी बुग्याल, पातर नौचयनिया, कैलुवा विनायक और भगुवावासा की प्राकृतिक सुंदरता से अभिभूत नजर आए। उनके लिए यह यात्रा पहाड़ की परंपरा और हिमालय को करीब से जानने का अनूठा अनुभव बनी हुई है।

 

हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें
शेयर करें !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!