posted on : June 25, 2021 6:02 pm

25 जून को मातृभूमि दिवस के रूप में मनाने की मुहिम

देश के कोने-कोने से लोगों नें साझा की गांव की तस्वीर

लोगों से अपनी जड़ो  और माटी थाती से जोडने की मुहिम

 

गोपेश्वर (चमोली)। पर्यावरणविद्ध, मैती आंदोलन के संस्थापक और पदमश्री सम्मान से सम्मानित कल्याण सिंह रावत की 25 जून को मातृभूमि दिवस के रूप में मनाने की अनूठी पहल लोगों को बेहद भायी। देश के कोने-कोने से लोगों नें अपनें गांव की फोटो को दीवारों पर लगाया और डिजिटल प्लेटफॉर्म फेसबुक पर गांव की फोटो को पोस्ट भी किया। लोगों से मिले अपेक्षित सहयोग से कल्याण सिंह रावत नें धन्यवाद भी अदा किया।

इस अवसर पर उन्होंने कहा की किसी भी कार्य की शुरुआत भले ही कठिन हो लेकिन दूरगामी परिणाम बेहद सुखद होते हैं। आज देश के कोने-कोने से लखनऊ, देहरादून, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, पोखरी, पीपलकोटी, देवाल, कर्णप्रयाग, टिहरी, गोपेश्वर सहित कई शहरों से लोगो नें अपने मकान के अतिथि कक्ष में गाव की फोटो लगाकर शेयर की, इस पहल को आगे बढाने के लिए सभी लोग बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि भविष्य में मातृभूमि दिवस लोगों को अपने गांव से भावनात्मक रूप से जोडेगा साथ ही लोग अपने गांव के विकास में अहम योगदान देंगे।

जनपद चमोली में किरूली पीपलकोटी संजय चैहान,  बेमरू-मठ गांव के शोधार्थी डाॅ. दीपक कुंवर, देवसारी -देवाल से महावीर सिंह गडिया, किमोली कपीरी पट्टी से शिक्षक दलवीर सिंह रावत, बैनोली से देवेश्वरी नेगी, मौणा नारायणबगड से विनोद सिंह नेगी, राम सिंह खत्री, संजय बिष्ट, खैनुरी गांव कमलेश कुमार मिश्रा सेलखोला, पोखरी कुमेडा गांव से डा. डीएस नेगी सहित सैकड़ों लोगों नें कल्याण सिंह रावत की इस अनूठी मुहिम के तहत अपने अपने गांव की तस्वीरों को साझा की।

 

ये था 25 जून को मातृभूमि दिवस के रूप में मनाने का उद्देश्य

लोगों को अपनी माटी थाती से जोडने की मुहिम जिसके तहत शुक्रवार 25 जून को सब लोग अपने अतिथि कक्ष या ड्राइंगरूम में अपने गांव की फोटो लगाएंगे। यदि किसी कारण लोग अपने गांव की फोटो प्राप्त नहीं कर सकते तो कम से कम एक कोरे कागज पर अपने गांव का नाम लिखकर अपनें कमरे में लगायेंगे साथ ही सभी लोग अपने गांव की फोटो फेस बुक पर भी अनिवार्य रूप से डालेंगे। जिसके पीछे उद्देश्य है कि अपने गांव से भावनात्मक रूप से जुड़ना और देवभूमि की संस्कृति, परम्परा, बोली, भाषा, जल, जंगल जमीन को बचाने का प्रयास है।

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