posted on : September 26, 2023 7:04 pm

-महिला पुलिस न होने से आंदोलनकारियों को रोकने में पुलिस के छूटे पसीने

-डीएम कार्यालय तक पहुंचने के लिए आशा कार्यकत्रियों और पुलिस के बीच हुआ संघर्ष, गेट धक्का मारकर परिसर तक जा पहुंची आशाऐं

चमोली। आशा फैसिलिटेटर संगठन, आशा स्वास्थ्य कार्यकत्री, आशा डिस्टिक काॅओडिनेटर और आशा ब्लाॅक काॅओडिनेटर संगठन की ओर से मंगलवार को चमोली जिला मुख्यालय गोपेश्वर की सड़कों पर अपनी मांगों को लेकर उतरी। जिलेभर से पहुंची आशा कार्यकत्रियों ने गोपीनाथ मंदिर  से जिलाधिकारी कार्यालय पर जुलूस निकाल कर प्रदर्शन किया। जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचने पर पुलिस ने उन्हें जिलाधिकारी कार्यालय के परिसर के अंदर जाने से रोकने का भरसक प्रयास किया लेकिन महिला पुलिस न होने के कारण पुरूष जवानों को आशा कार्यकत्रियों को रोकने में काफी पसीना बहाना पड़ा। बावजूद इसके पुलिस के जवान आशाओं को रोकने मे सफल न हो सके और आशाऐं गेट को धक्का मार कर परिसर के अंदर घूस गई और सरकार और प्रशासन के विरोध में नारेबाजी करते रहे। इस बीच एक आशा कार्यकत्री बेहोश भी हो गई थी। आशा कार्यकत्रियों का आरोप है कि जिलाधिकारी उनसे मिलने अपने चैंबर से बाहर नहीं आये। जबकि आशाऐं पूरे जिले भर से अपनी मांगों को लेकर डीएम को मिलने पहुंचे थे।

अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आशा कार्यकत्रियों के संगठनों ने सोमवार को जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन किया। इनका प्रदर्शन गोपीनाथ मंदिर से होता हुआ जिलाधिकारी कार्यालय पर पहुंचा। जहां पर आशाओं ने अपने ज्ञापन के साथ डीएम से मिलने की मांग की लेकिन पुलिस ने उन्हें परिसर के अंदर जाने के लिए बने गेट पर ही रोक दिया। जिस पर आशाऐं आक्रोश में आ गई और उन्हें गेट को धक्का मारना शुरू किया। काफी देर तक पुलिस इन्हें रोकने का प्रयास भी करती रही लेकिन महिला पुलिस न होने की दशा में पुलिस आशाओं के सघर्ष के सामने नहीं टिक पायी और आशाऐं गेट को धक्का मारते हुए अंदर जा पहंुची जहां पर फिर से पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। इसी बीच कुछ महिला पुलिस भी मौके पर पहुंच गई थी।

आशा फैसिलिटेटर संगठन की जिलाध्यक्ष किरन बिष्ट, सचिव मोनिका रौतेला, आशा स्वास्थ्य कार्यकत्री संगठन की अध्यक्ष विनीता पुरोहित, सचिव सुनीता राणा का कहना है कि उनका संगठन लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करता आ रहा है लेकिन उनकी मांग नहीं सुनी जा रही है। इसी को लेकर सोमवार को प्रदेश स्तर पर आंदोलन का आह््वान किया गया था। उन्होंने कहा कि हमारी मांग है कि आशा फेसिलिटेटरों का 20 दिन का मोबिटिली बढ़ा कर 30 दिन का किया जाए, क्षेत्र भ्रमण का यात्रा भत्ता दिया जाए, पीएलए बैठक का भत्ता बढ़ाया जाए, आशा कार्यकत्रियों को राज्य कर्मचारी घोषित किया जाए, पांच लाख का निशुल्क बीमा किया जाए, एक वर्ष में दो बार गणवेश भत्ता दिया जाए, आशा घरो का निर्माण किया जाए शामिल है। इसी को लेकर उनका आंदोलन चलाया जा रहा है। इस मौके पर गीता गौड, माहेश्वरी, पूनम, इंद्रा देवी, कुसुम, सुनीता, सरोज भंडारी, लक्ष्मी बोरा, अनिता, धनुली रावत, मुन्नी चंदोला, ज्योति, विमला, ललिता रावत आदि मौजूद थे।

 

जिलाधिकारी के अपने कार्यालय से बाहर न आने पर जताया रोष

आशा कार्यकत्रियों किरन बिष्ट, सरोजनी भंडारी, विनीता देवी, लक्ष्मी फरस्वाण आदि का कहना है कि वे लोग अपनी समस्याओं को लेकर जिले भर से यहां पहुंची थी लेकिन डीएम ने अपने कार्यालय के अंदर से बाहर आकर उनकी समस्याओं को सुनने की जहमत तक नहीं उठायी। जबकि वे चमोली जिले के एक अभिभावक है और हर एक का अधिकार है कि अपनी समस्या लेकर उनके पास जाय और जिलाधिकारी उनकी समस्या को सुने लेकिन जिलाधिकारी का यह व्यवहार उन्हें जायज नहीं लगा। उनका कहना था कि उन्हें यह पता है कि उनकी अधिकांश समस्याऐं शासन स्तर की है जिसका निराकरण शासन स्तर पर होना है लेकिन एक जिले के एक अभिभावक के रूप में उन्हें उनकी समस्याओं को सुनना चाहिए था और उन्हें सिर्फ आश्वास भर ही दे देते तो उन्हें अच्छा लगता।

बड़ा सवालः आशाओं के प्रदर्शन के साथ नहीं थी महिला पुलिस

यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि आशाओं का प्रदर्शन गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर से होता हुआ लगभग एक से दो किलोमीटर का सड़क मार्ग से होता हुआ जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंचा लेकिन इस बीच पूरे रास्ते भर पुलिस की ओर से महिला पुलिस का कोई इंतजाम नहीं किया गया था। यहां तक की जब आशाऐं गेट को धक्का मार कर डीएम कार्यालय के परिसर में प्रवेश करने के लिए संघर्ष कर रही थी इस बीच भी कोई महिला पुलिस यहां पर नहीं थी। जिस कारण पुरूष सिपाहियों को काफी पसीना बहना पड़ा। आशा फैसिलिटेटर संगठन की जिलाध्यक्ष किरन बिष्ट का कहना है कि उनका इतना बड़ा आंदोलन चल रहा था और गोपीनाथ मंदिर से डीएम कार्यालय पर गया लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से केवल पुरूष पुलिस कर्मी ही लगाये गये थे। जबकि नियमानुसार महिला पुलिस को भी साथ होना चाहिए था। जिलाधिकारी के कार्यालय में जाने वाले गेट पर भी उन्हें रोकने के लिए पुरूष सिपाही ही खडे़ थे। जब सभी आशा कार्यकत्री गेट से अंदर चली गई तब जाकर काफी देर बाद दो-तीन महिला पुलिस कर्मी वहां पहुंची। महिलाओं के आंदोलन में महिला पुलिस कर्मियों का न होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

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