posted on : April 6, 2026 6:36 am

देहरादून: उत्तराखंड की स्थाई राजधानी का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। ‘दबी जुबां’ न्यूज़ पोर्टल के साथ खास बातचीत में आंदोलनकारियों और विशेषज्ञों ने सरकार की नीतियों पर कड़े सवाल उठाए हैं। उत्तराखंड राज्य स्थापना के 25 साल बाद भी गैरसैंण को स्थाई राजधानी न बनाए जाने पर जनता में भारी रोष है।

आंदोलन की गूँज और सरकार को चेतावनी

देहरादून में 8 मार्च से जारी क्रमिक अनशन अब एक बड़े आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। आंदोलनकारी लक्ष्मी प्रसाद ने बताया कि वे लंबे समय से यहां डटे हुए हैं और जब तक सरकार गैरसैंण को लेकर कोई ठोस निर्णय नहीं लेती, उनका संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यदि 2027 के चुनाव से पहले कोई हल नहीं निकला, तो सरकार को इसका खामियाजा भुगतना होगा।

संवैधानिक और आर्थिक पहलू

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी (IAS) विनोद प्रसाद रतूड़ी ने इस मुद्दे पर संवैधानिक प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 2, 3 और 12 में कहीं भी ‘अस्थाई राजधानी’ का प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा:

“प्रदेश के 3500 से अधिक गांव खंडहर बन चुके हैं और लोग पलायन कर रहे हैं। जब तक राजधानी पहाड़ में नहीं होगी, तब तक रिवर्स माइग्रेशन (गांव वापसी) संभव नहीं है।”

रतूड़ी जी ने प्रदेश के आर्थिक हालातों पर भी चिंता व्यक्त की और बताया कि उत्तराखंड वर्तमान में भारी कर्ज के बोझ तले दबा है। उन्होंने देहरादून की बढ़ती अपराध दर और स्मार्ट सिटी के नाम पर हो रही बदहाली का भी जिक्र किया।

युवाओं की भूमिका और भविष्य की रणनीति

रिपोर्टिंग के दौरान यह बात भी सामने आई कि युवा वर्ग मुकदमे और जेल के डर से आंदोलनों से पीछे हट रहा है। हालांकि, आंदोलनकारियों का मानना है कि पहाड़ और राज्य के भविष्य के लिए युवाओं को आगे आना ही होगा।

प्रधानमंत्री के दौरे पर टिकी निगाहें

आंदोलनकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 14 अप्रैल के प्रस्तावित देहरादून दौरे पर बड़ी उम्मीदें जताई हैं। उन्होंने एक ज्ञापन भी तैयार किया है जिस पर सैकड़ों लोगों के हस्ताक्षर हैं। यदि प्रधानमंत्री इस दौरे पर गैरसैंण को स्थाई राजधानी घोषित नहीं करते हैं, तो आंदोलनकारी अपने क्रमिक अनशन को ‘आमरण अनशन’ में बदलने की तैयारी कर रहे हैं।

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