गोपेश्वर (चमोली)। चमोली जिले के जोशीमठ विकास खंड के दूरस्थ क्षेत्र सलूड में शुक्रवार को एक्शन एड़ एसोसिएशन इंडिया के तत्वावधान में जनदेश के सहयोग से हिमालय बचाओ अभियान के तहत बीज बचाओ पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें यह बात निकलकर सामने आयी कि परंपरागत बीजों का प्रकृति के संरक्षण में अहम भूमिका रही है। लिहाजा पहाड़ों में मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
गोष्ठी में स्वयं सेवी संस्था जनदेश के सचिव लक्ष्मण सिंह नेगी ने कहा कि पहाड़ों में परंपरागत बीजों से प्रकृति के संरक्षण में बड़ा योगदान रहा है। मोटे अनाजों की खेती पर्यावरण के अनुकूल रही है। वर्तमान में बदलते हुए जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से यदि खेती बच सकती है तो मोटे अनाजों की खेती ही जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए कारगर उपाय हो सकता है। उन्होंने कहा कि कम पानी में हम कैसे उत्पादन अधिक बढ़ाएं यह परंपरागत खेती में निहित है। पहाड़ों में लगातार भूस्खलन, बाढ़, सूखा की समस्या से निपटने के लिए हमें अपनी पारंपरिक खेती में अमूलचूल परिवर्तन करना पड़ेगा। इसके लिए अपने बीजों को बचाने की आवश्यकता है। हमारे क्षेत्र में राजमा, चैलाई,,मंडुवा, चीणा, धान, दाल की कई प्रजातियां थी वह धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। वर्तमान में पहाड़ी अनाज का बीज बैंक बनाने की आवश्यकता है जिससे पहाड़ी बीज बच सके।
गोष्ठी में देवग्राम के प्रधान देवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि हमें अपने बीजों को बचाने के लिए अभी से युद्ध स्तर पर काम करने की आवश्यकता है। जंगली जानवर हमारी खेती को लगातार नुकसान पहुंचाते जा रहे है इसके लिए खेती के अनुरूप विकास योजनाओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता है ताकि लोगों को अधिक उत्पादन मिल सके। ग्राम प्रधान सलूड प्रमिला देवी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है, लगातार जंगलों का काटना, बड़ी-बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं बनना और उससे निकलने वाले मलबे का सही निस्तारण न होने से पेड़ पौधों को पहुंचने वाला नुकसान। उनका यह भी कहना था कि जिस जगह से हाई टेंशन लाइन गुजर रही है उसके आसपास के पेड़ पौधे सुखते नजर आ रहे है। उन्होंने मोबाइल टावरों के कारण पक्षियों की संख्या में हो रही कमी पर भी चिंता व्यक्त की। अत्यधिक सड़क की चैड़ीकरण के कारण काटे जाने वाले पेड़ पौधों के नुकसान से भी जलवायु में बदलाव दिख रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे गांव में आज से 20 से 25 वर्ष पूर्व पांच फीट से अधिक बर्फ गिरती थी अब मुश्किल से आधा फिट भी बर्फ पूरी जनवरी के माह में नहीं गिर रही है, जिससे फसलो का उत्पादन घट रहा है, कीट पतंग बढ़ गए हैं। इन सब बातों पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। हिमालय बचाने के संकल्प में महिलाओं ने तय किया कि हम अपने जंगलों की संरक्षण के लिए प्रयास करेंगे और पौधों का रोपण करेंगे, नमी संरक्षण के लिए चाल खाल का निर्माण, पॉलिथीन पर रोक लगाने के साथ ही बागवानी और कृषि को बढ़ावा देने और वन अग्नि सुरक्षा के कार्यक्रम में सहयोग करने की बात कही। इस अवसर पर कलावती शाह, ममता सती, बीना देवी, अनीता देवी, रामेश्वरी देवी, पूजा, ललीता, मुन्नी देवी, सरिता ने अपने विचार रखे।
