- भाजपा व कांग्रेस दोनों ने भोगा सत्ता सुख पर पलायन नहीं रूका
गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड राज्य बने 25 साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन पहाड़ से पलायन का सिलसिला आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। राज्य गठन के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों की सरकारें सत्ता में रहीं। पलायन रोकने के लिए योजनाएं बनीं, घोषणाएं हुईं, पलायन आयोग का गठन किया गया और सांसदों ने गांव गोद लेकर उन्हें आदर्श बनाने का दावा किया, लेकिन इसके बावजूद पहाड़ के कई गांव लगातार खाली होते जा रहे हैं।
राज्य गठन के समय लोगों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार होगा। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और युवाओं को रोजी-रोटी के लिए मैदानी क्षेत्रों की ओर नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन ढाई दशक बाद भी यह उम्मीद पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर पाई है।
पलायन का सबसे बड़ा कारण गांवों में रोजगार के पर्याप्त अवसरों का अभाव माना जाता है। खेती-किसानी लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान, खेती की बढ़ती लागत, बाजार की कमी और उत्पादन का उचित मूल्य नहीं मिलने से ग्रामीणों का कृषि से मोहभंग हो रहा है। दूसरी ओर बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में युवा लगातार शहरों की ओर जा रहे हैं।
सरकारों ने पलायन रोकने के लिए पर्यटन, बागवानी, स्वरोजगार, होम स्टे, ग्रामीण आजीविका और अन्य योजनाएं शुरू कीं, लेकिन इन योजनाओं का असर अभी तक व्यापक स्तर पर दिखाई नहीं दे रहा है। कई दूरस्थ गांवों में आज भी स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव लोगों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर करता है।
पलायन की समस्या को गंभीरता से लेते हुए राज्य में पलायन आयोग का गठन भी किया गया। आयोग ने पलायन के कारणों का अध्ययन कर कई सुझाव दिए, लेकिन आयोग की रिपोर्ट और सुझावों के बावजूद गांवों से लोगों का पलायन पूरी तरह रोकने में सरकारें सफल नहीं हो पाईं। सवाल उठता है कि जब समस्या के कारण सामने आ चुके थे तो उनके समाधान के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए।
सांसदों द्वारा गांवों को गोद लेकर विकास का मॉडल तैयार करने की पहल भी हुई। उम्मीद थी कि इन गांवों में बेहतर सुविधाएं और रोजगार के अवसर पैदा होंगे और दूसरे गांव भी इससे प्रेरणा लेंगे। लेकिन कई गोद लिए गए गांवों में भी पलायन की समस्या बनी हुई है। इससे सांसद आदर्श ग्राम योजना की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठते हैं।
पलायन का असर अब केवल आबादी तक सीमित नहीं है। गांवों में खेत बंजर हो रहे हैं, पारंपरिक खेती प्रभावित हो रही है और कई स्थानों पर घरों में ताले लटक रहे हैं। बुजुर्ग आबादी गांवों में रह गई है, जबकि युवा पीढ़ी बाहर बसती जा रही है। इससे पहाड़ की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी प्रभावित हो रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल लंबे समय तक प्रदेश की सत्ता में रहे हैं। दोनों ने पलायन रोकने के लिए अपनी-अपनी नीतियां और योजनाएं बनाईं, लेकिन किसी भी सरकार के कार्यकाल में ऐसा स्थायी मॉडल तैयार नहीं हो पाया, जिससे गांवों में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो और युवाओं को वापस गांव लौटने का भरोसा मिले।
अब जरूरत केवल नई घोषणाएं करने की नहीं, बल्कि पहले से संचालित योजनाओं के परिणामों की समीक्षा करने की है। सरकार को यह देखना होगा कि कितने युवाओं को गांव में रोजगार मिला, कितने परिवार वापस गांव लौटे और कितने खाली गांव दोबारा आबाद हुए।
यदि पहाड़ में स्थानीय रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, कृषि और बागवानी के लिए बाजार तथा स्वरोजगार के स्थायी अवसर पैदा नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में पलायन की समस्या और गंभीर हो सकती है। राज्य गठन के 25 साल बाद भी खाली होते गांव यह सवाल जरूर खड़ा कर रहे हैं कि अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ के लोगों की जिंदगी बदलने के दावे आखिर धरातल पर कितने उतर पाए हैं।
