गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों कई मोर्चों पर सक्रिय नजर आ रही है। सत्तारूढ़ भाजपा जहां विकास, निवेश और धार्मिक पर्यटन को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के सामने रख रही है, वहीं कांग्रेस जनहित के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने में जुटी है। इन दोनों राष्ट्रीय दलों के बीच राज्य आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकला उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) भी अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश में सक्रिय दिखाई दे रहा है।
प्रदेश में भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता में है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, सड़क संपर्क और चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं को बड़ी उपलब्धियों के रूप में पेश कर रही है। भाजपा संगठन बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क और केंद्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के दम पर अपनी स्थिति मजबूत मान रहा है। हालांकि बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी और बढ़ती महंगाई जैसे मुद्दे सरकार के सामने चुनौती बने हुए हैं।
दूसरी ओर कांग्रेस संगठन को पुनर्जीवित करने में लगी है। प्रदेश प्रभारी शैलजा के हालिया दौरों के बाद कार्यकर्ताओं में सक्रियता बढ़ी है। कांग्रेस सरकार को बेरोजगारी, कर्मचारियों की पुरानी पेंशन, पंचायत प्रतिनिधियों की मांगों और पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर घेर रही है। हालांकि कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती अब भी आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व की एकजुटता को लेकर मानी जा रही है।
इसी बीच उत्तराखंड क्रांति दल फिर से राज्य आंदोलन की मूल भावना और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों को उठाकर जनता के बीच अपनी पहचान मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। उक्रांद लंबे समय से गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने, पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग विकास नीति, स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता और जल-जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाता रहा है। हालांकि लगातार चुनावों में कमजोर प्रदर्शन और संगठनात्मक बिखराव के कारण पार्टी का जनाधार सीमित हुआ है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उक्रांद के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने जनाधार को वापस हासिल करने की है। राज्य आंदोलन के समय जिस भावनात्मक जुड़ाव के साथ लोगों ने उक्रांद को समर्थन दिया था, वह अब काफी कमजोर हो चुका है। भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई में क्षेत्रीय दलों के लिए राजनीतिक जगह लगातार कम होती गई है।
फिर भी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दों, भू-कानून, मूल निवास, रोजगार और पलायन जैसे विषयों पर यदि उक्रांद आक्रामक तरीके से जनता के बीच जाता है तो वह आगामी चुनावों में कुछ क्षेत्रों में प्रभाव डाल सकता है। खासकर युवा वर्ग और राज्य आंदोलन से जुड़े पुराने लोगों के बीच पार्टी अब भी अपनी पहचान बनाए हुए है।
प्रदेश की मौजूदा राजनीति में पंचायत प्रतिनिधियों के आंदोलन, कर्मचारियों की मांगें, चारधाम यात्रा, आपदा प्रबंधन और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं। आने वाले समय में भाजपा विकास और स्थिरता के मुद्दे पर चुनावी रणनीति बनाएगी, कांग्रेस जनाक्रोश को राजनीतिक समर्थन में बदलने का प्रयास करेगी, जबकि उक्रांद क्षेत्रीय अस्मिता और उत्तराखंडियत के मुद्दों के सहारे अपनी राजनीतिक वापसी की राह तलाशता नजर आ रहा है।
