गोपेश्वर (चमोली)। विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान फिर सतह पर आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को हाईकमान की आपत्ति के बावजूद जारी रखना इसी टकराव का ताजा उदाहरण है। यात्रा रोकने के निर्देश के बाद भी रावत जसपुर से हल्द्वानी तक कार्यक्रम करते रहे। अब कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें दिल्ली तलब किया है।
विवाद की शुरुआत यात्रा के आयोजन को लेकर हुई। प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने रावत को पत्र लिखकर आपत्ति जताई कि कार्यक्रम की जानकारी न तो उन्हें दी गई और न प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष से चर्चा हुई। हाईकमान का जोर 2027 के चुनाव में साझा कार्यक्रम और सामूहिक अभियान पर है, जबकि रावत की यात्रा ने पार्टी के भीतर व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता और संगठनात्मक रणनीति के बीच खिंचाव को उजागर कर दिया।
इस टकराव की जड़ सिर्फ यात्रा नहीं है। कांग्रेस में लंबे समय से नेतृत्व और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर अलग-अलग धु्रव सक्रिय रहे हैं। रावत का अपना जनाधार और राजनीतिक नेटवर्क है, वहीं प्रदेश संगठन चुनावी कमान को सामूहिक नेतृत्व के तहत चलाना चाहता है। चुनाव करीब आने के साथ यह सवाल अहम होता जा रहा है कि अभियान की दिशा और फैसलों में किसकी भूमिका निर्णायक होगी।
इसके साथ टिकटों की दावेदारी भी खींचतान का बड़ा कारण बन सकती है। जुलाई में विधानसभा टिकटों को लेकर पार्टी के भीतर विरोध और विवाद सामने आ चुका है। अब चुनावी तैयारियां तेज होने के साथ अलग-अलग नेताओं के समर्थकों के बीच टिकट को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ना तय माना जा रहा है। ऐसे में नेतृत्व का सवाल टिकट वितरण से भी जुड़ जाता है।
रावत की यात्रा के दौरान वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह का उनके साथ दिखाई देना भी इसी राजनीतिक संदर्भ में चर्चा में है। इसे भले ही दोनों नेताओं की अलग-अलग गतिविधियों के तौर पर देखा जाए, लेकिन चुनाव से पहले बड़े नेताओं की राजनीतिक नजदीकियां पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन के संकेत के रूप में देखी जाती हैं।
यही वजह है कि मौजूदा विवाद को केवल रावत और हाईकमान के बीच मतभेद मानना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि कांग्रेस अपने प्रभावशाली नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक ताकत को संगठन की साझा रणनीति के साथ कैसे जोड़ेगी। हाईकमान के लिए चुनौती यह भी है कि वरिष्ठ नेताओं को साथ रखते हुए संगठनात्मक अनुशासन और एकजुट चुनावी संदेश कायम रहे।
फिलहाल नेतृत्व ने टकराव को अनुशासनात्मक कार्रवाई में बदलने के बजाय बातचीत का रास्ता चुना है। प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा के अनुसार सात या आठ अक्टूबर को रावत से बातचीत हो सकती है। उनका पक्ष सुनने के बाद आगे का निर्णय लिया जाएगा।
इस खींचतान का असर कार्यकर्ताओं पर भी पड़ सकता है। चुनावी तैयारी के समय शीर्ष नेतृत्व से स्पष्ट और एकजुट संदेश संगठन के लिए जरूरी होता है। अलग-अलग राजनीतिक गतिविधियां और नेतृत्व को लेकर अस्पष्टता बूथ स्तर तक असमंजस पैदा कर सकती है।
2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस के पास मतभेद सुलझाने का वक्त है, लेकिन रावत की यात्रा ने पार्टी के सामने मूल चुनौती साफ कर दी हैकृव्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव और सामूहिक संगठनात्मक नेतृत्व के बीच संतुलन। भाजपा से मुकाबले की तैयारी के साथ कांग्रेस को पहले यह तय करना होगा कि उसके नेता किस साझा रणनीति और किस नेतृत्व व्यवस्था के तहत चुनाव मैदान में उतरेंगे।
