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posted on : September 17, 2024 5:34 pm
Independence Day 2026 Greetings

गोपेश्वर (चमोली)। पितृ पक्ष शुरु होते ही बदरीनाथ धाम में श्रद्धालुओं की बढी आमद पितृ पक्ष के शुरु होते ही बदरीनाथ में पिंडदान और तर्पण के लिये तीर्थयात्रियों के पहुंचने का सिलसिला शुरु हो गया है। पितृ पक्ष के पहले श्रद्धालुओं ने ब्रहम कपाल में पितृ मोक्ष के लिये पिंडदान और तर्पण किया।

हिन्दू धर्म में ब्रह्म कपाल में तर्पण और पिंडदान का विषेश महात्म्य बताया गया है। ऐसे में यहां प्रतिवर्ष देश और विदेश से श्रद्धालु पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान के लिये बदरीनाथ पहुंचते हैं। ब्रहम कपाल तीर्थपुरोहित उमेश सती, शरद सती, राकेश सती, ने बताया कि पितृ पक्ष के पहले दिन तीन हजार लोगों ने धाम में पिंडदान और तर्पण किया है। जबकि बड़ी संख्या में श्रद्धालु पिंडदान और तर्पण की तिथि की जानकारी ले रहे हैं।

श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के मीडिया प्रभारी डा. हरीश गौड़ ने बताया कि मानसून में अपेक्षाकृत यात्रा में कमी के बाद श्राद्ध पक्ष  शुरू  होते ही तथा नवरात्रि के दौरान श्री बदरीनाथ-केदारनाथ धाम में श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि हो जाती है।

 

ब्रह्मकपाल तीर्थ की मान्यता

याज्ञवल्क्य स्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य लिखते है, आयुः प्रजा, धन विद्यां स्वर्ग, मोक्ष सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्य पितरः श्राद्ध तर्पिता। अर्थात पितर श्राद्ध से तृप्त होकर आयु, पूजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, राज्य व अन्य सभी सुख प्रदान करते है। मान्यता है कि ब्रह्माजी जब स्वयं की ओर से उत्पन्न शतरूपा (सरस्वती) के सौंदर्य पर रीझ गए तो शिव ने त्रिशूल से उनका पांचवा सिर काट दिया। जिस पर उनका सिर त्रिशूल पर चिपक गया और उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप भी लगा। जिसके निवारण को शिव आर्यावर्त के तीर्थ स्थलों पर गए, लेकिन उन्हें ब्रहम हत्या के पाप से मुक्ति नहीं मिली। जिस पर वे अपने धाम कैलाश लौटने लगे। इस दौरान बटिकाश्रम के पास अलकनंदा नदी के तट पर बदरीनाथ के इस स्थान पर ब्रह्माजी का पांचवा सिर त्रिशूल से धरती पर गिर गया। इसी स्थान पर शिव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली। श्रीमद् भागवत महापुराण के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने भी यहां गोत्र, ब्राहमण और गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति के लिये पिंडदान और तर्पण किया था। स्कंद पुराण में पिंडदान के लिए गया, पुष्कर, हरिद्वार, प्रयागराज औरकाशी को श्रेयस्कर बताया गया है। लेकिन बदरीनाथ धाम स्थित ब्रह्मकपाल में किया गये पिंडदान को सबसे आठ गुणा ज्यादा फलदायी बताया गया है।

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