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posted on : September 12, 2026 5:04 pm
  • भू-धंसाव और क्षमता से ज्यादा पशुचारण ने बढ़ाई चिंता

रुद्रप्रयाग। हिमालय की प्राकृतिक धरोहर बुग्याल अब बढ़ते मानवीय दबाव की मार झेल रहे हैं। कहीं भू-धंसाव चिंता बढ़ा रहा है तो कहीं बुग्यालों की धारण क्षमता से अधिक पशुचारण उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। प्लास्टिक कचरे और अनियंत्रित गतिविधियों से पैदा हो रहे संकट के बीच चंडी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र गोपेश्वर का पांच दिवसीय ‘बुग्याल बचाओ जनजागरण एवं अध्ययन अभियान’ संपन्न हुआ। अभियान दल ने रुद्रप्रयाग के त्रियुगीनारायण से लेकर टिहरी जिले की भिलंगना घाटी तक एक दर्जन से अधिक बुग्यालों का अध्ययन कर संरक्षण के लिए सामूहिक संकल्प लिया।

पत्रकार व्योमेश जुगरान के नेतृत्व में चले अभियान की शुरुआत फाटा गांव से हुई। फाटा और त्रियुगीनारायण में आयोजित गोष्ठियों में ग्रामीणों, पशुपालकों और बुग्यालों में रहने वाले चरवाहों के साथ बुग्यालों की स्थिति और संरक्षण की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई। अभियान में सामाजिक कार्यकर्ता, वनविद, पत्रकारों के साथ केदारनाथ वन्यजीव वन प्रभाग और टिहरी वन प्रभाग के अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल रहे।

अभियान दल पंवालीकांठा बुग्याल से होते हुए घुत्तू पहुंचा, जहां गोष्ठी में जिला पंचायत सदस्य विजय लाल ने बुग्यालों में बढ़ते पशुचारण पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हिमालय की इन प्राकृतिक धरोहरों को बचाने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि स्थानीय समुदाय और सभी संबंधित लोगों को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी।

समापन गोष्ठी में व्योमेश जुगरान ने हिमालय के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिमालय सनातन संस्कृति का आधार और जीवन का मूल स्रोत है। उन्होंने कहा कि पुराणों में हिमालय को भगवान शिव का आलय बताया गया है और वेदव्यास की कर्मभूमि भी हिमालय रहा है। ऐसे में बुग्यालों का संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाने का भी सवाल है।

ओम प्रकाश भट्ट ने पंवाली बुग्याल की स्थिति को चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर भू-धंसाव शुरू हो गया है, जबकि बुग्यालों में पशुओं की संख्या उनकी धारण क्षमता से कहीं अधिक है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज बुग्यालों की संवेदनशीलता को सदियों पहले समझ चुके थे। इसी कारण उन्होंने बुग्यालों में समय से पहले प्रवेश, रहने के तौर-तरीकों और विभिन्न गतिविधियों को लेकर कई परंपरागत नियम बनाए थे।

चंडी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र के विनय सेमवाल ने बताया कि केंद्र वर्ष 2014 से बुग्याल संरक्षण अभियान चला रहा है। इसके तहत स्वयंसेवी बुग्यालों में हो रहे बदलावों का अध्ययन करने के साथ वहां जमा कचरे को एकत्र कर निस्तारण स्थल तक पहुंचाते हैं।

मोहन पंत ने पर्यटकों से हिमालयी यात्राओं के दौरान प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करने और अपने साथ कचरे के लिए अलग बैग रखने की अपील की। सामाजिक कार्यकर्ता सुशील भट्ट ने हिमालय क्षेत्र में स्थानीय प्रजातियों के पौधों के रोपण और बुग्यालों में काम करने वाले टूरिस्ट गाइडों को प्रशिक्षित किए जाने की जरूरत बताई।

गोष्ठी में विनय सेमवाल, सुशील भट्ट, टिहरी वन प्रभाग के वन दरोगा मंगल सिंह गुसाईं, संदीप राणा, शिव सिंह राणा, क्षेत्र पंचायत सदस्य रतनमणि भट्ट, नित्यानंद कोठियाल, अक्षित रावत, राजेंद्र सिंह चौहान, परमवीर सिंह रावत, प्रेम सिंह राणा, अरविंद और सुरजीत सिंह चौहान सहित कई लोग मौजूद रहे।

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