गोपेश्वर (चमोली)। होली पर्व को लेकर असमजस के हालात बन गए हैं। अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि होलिका दहन दो मार्च को होगा अथवा तीन तारीख को। मुहुर्त को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। धुलेंडी को लेकर भी असमजस की स्थिति बनी है। ज्योतिषाचार्य डा. चंडी प्रसाद घिल्डियाल ने इस सवाल पर चुपी तोड़ी है। उनका कहना है कि शास़्त्रों के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को प्रदोष काल में भद्रा रहित समय पर होलिका दहन का विधान है। इस बार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा दो मार्च को प्रदोष काल में व्याप्त है। यह तीन मार्च को सांय काल 5ः12 बजे पर सूर्यास्त से पूर्व ही समाप्त हो रही है। इसलिए भद्रा के पुच्छ काल में रात्रि को 1ः27 से 2ः39 बजे तक होलिका दहन हो सकता है। अथवा तीन मार्च को सुबह 5ः30 बजे पर भद्रा की समाप्ति के बाद 6ः20 तक होलिका दहन करना समाज के हित में शास्त्र सम्मत रहेगा। चूंकि सूर्योदय 6ः44 पर होगा और चंद्रग्रहण का सूतक काल भी 6ः20 के बाद शुरू होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिति भी कहीं-कहीं अनुकूल न हो तो तीन मार्च को उदय व्यापिनी पूर्णमासी है। इसलिए सांयकाल सात बजे ग्रहण के समाप्ति के बाद साढे आठ बजे तक देशकाल परिस्थिति के अनुसार भी होलिका दहन किया जा सकता है।
डा. घिल्डियाल ने चंद्रग्रहण पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि पूर्णमासी का व्रत रखने वालों को दो मार्च को व्रत रखना होगा। भारत में दृश्य होने वाले इस खग्रास ग्रस्तोदय चंद्रग्रहण का सूतक तीन मार्च को सुबह 6ः20 से शुरू हो जाएगा और भारतीय समयानुसार यह दोपहर 3ः27 से 6ः56 तक दिखाई देगा। बताया कि यह ग्रहण सिंह राशि और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में घटित होगा। उन्होंने कहा कि तीन मार्च को चंद्रग्रहण होने की वजह से धूलंडी अथवा छरोली चार मार्च को फाल्गुन प्रतिपदा में मनाना शास्त्र सम्मत रहेगा। ज्योतिषाचार्य डा. घिल्डियाल ने रंगों के महोत्सव की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि चूंकि होली पर ग्रहण का साया है और सौरमंडल में ग्रहों की स्थिति बदल रही है। इसलिए कोई अप्रिय घटना घटित होने के लिए सही रंगों का प्रयोग करना होगा। होली खेलते समय किसी प्रकार का दुराग्रह मन में न रखते हुए सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे की मिशाल कायम कर होली पर्व को उत्साह से मनाना चाहिए।
