श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा समान नागरिक संहिता पर एक दिवसीय परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा का संचालन करते हुए शोध छात्र देवेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में इसका इसका वर्णन किया गया है तथा समान नागरिक संहिता का आशय निजी धार्मिक कानूनों तथा विभिन्न धर्मों के सिविल कानूनों में एकरूपता स्थापित करने से है। शोध छात्र मयंक उनियाल ने कहा कि समान नागरिक संहिता एक प्रगतिशील, लोकतांत्रिक तथा समतामूलक समाज की आवश्यकता है लेकिन इसके साथ ही हमें विविधता को भी ध्यान में रखना होगा। इसे एक झटके में लागू नहीं किया जा सकता है बल्कि धीरे -धीरे चरणबद्ध तरीके से इसे लागू किया जाना चाहिए यही कारण है कि संविधान में नीति-निर्देशक तत्वों में इसे शामिल किया गया है। इसके साथ ही समान नागरिक संहिता लागू करते समय संविधान के अनुच्छेद 15 तथा अनुच्छेद 25 को समान रूप से ध्यान में रखना होगा ।
शोध छात्र अरविंद रावत ने कहा कि लैंगिक समानता स्थापित करने तथा राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए यूसीसी जरूरी है । सभी नागरिकों को उनके धर्म ,वर्ग, जाति, लिंग आदि के बावजूद समान दर्जा प्रदान करने के लिए भी समान नागरिक संहिता अति आवश्यक है। भारत की विविधता के कारण, नियमों को एक समान करना कठिन है लेकिन असम्भव नहीं है। 1985 में पहली बार प्रसिद्ध शाहबानो केस (ट्रिपल तालाक केस) था जिसमें सर्वाेच्च न्यायालय ने संसद को यूसीसी फ्रेम करने का निर्देश दिया था।
राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एमएम सेमवाल ने कहा कि समान नागरिक संहिता एक ऐसी धारणा है जो पूरे देश में सभी धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार आदि में एक समान कानून का प्रावधान करती है जो वर्तमान समय में केवल गोवा राज्य में लागू है। भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे के समान नागरिक संहिता पर दिए बयान के कारण बुद्धिजीवियों और शैक्षणिक जगत में फिर से इस विषय पर चर्चा होने लगी है। समान नागरिक संहिता भारत के लिए आवश्यक जरूर है किंतु हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है जहां अनेक धर्म वाले लोग रहते हैं। संविधान सभा में भी समान नागरिक संहिता पर काफी उत्तेजित बहस हुई और अंत में वोटिंग के द्वारा इसे राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत अनुच्छेद 44 में वर्णित किया गया किंतु समान नागरिक संहिता का निर्माण और इसे लागू करना संविधान निर्माताओं की अपेक्षा थी जिसे आज तक लागू नहीं किया जा सका लेकिन धीरे धीरे निजी कानूनी प्रक्रियाओं को संहिताबद्ध करके इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संविधान सभा मे भी इस पर काफी रोचक बहस हुई अंबेडकर ने समान नागरिक संहिता के खिलाफ तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि अगर सामाजिक मसलों पर निजी कानूनों को बचाया गया तो हम यथास्थितिवाद के शिकार हो जाएंगे, धर्म पारंपरिक समाजों में बृहत और अपरिमित शक्ति धारण करता था जो जीवन के हरेक क्षेत्र को प्रभावित करता था लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में धर्म के इस विशेषाधिकार को सीमित करना होगा। साथ ही जिस तरह से हिन्दू धर्म के भीतर से ही सुधारवादी कदम उठाए गए ठीक उसी प्रकार दूसरे धर्मों में भी अमूलचूल परिवर्तन उसके भीतर से ही लोग उठा सकते हैं बजाय कि बाहरी तत्व इसके सुधार को लेकर कदम उठाएं । इस मामले में हिन्दू धर्म मे विभिन्न समयकालों में हुए सुधार नज़ीर बन सकते हैं
शोध छात्रा सबीना अख्तर ने इसको परिभाषित किया और कहा कहा कि इनके क्रियान्वयन के लिए समाज और सरकार को परस्पर विश्वास निर्माण करना होगा साथ ही लोकहित को मध्यनजर रखते हुए इसे चरणबद्ध ढंग से लागू करना चाहिए। शोध छात्र विजय मोहन ने कहा कि इसके मुद्दे की वोट बैंक की राजनीति के चलते लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है साथ ही समान नागरिक संहिता द्वारा समानता स्थापित करने का विचार विविधता एवं धर्मनिरपेक्षता को नुकसान पहुंचा सकता है। शोध छात्रा शैलजा मनोड़ी ने कहा कि संविधान सभा में भी इस विषय पर गहन चर्चा की गई तथा अंत में मौलिक अधिकार समिति ने 5ः4 के अनुपात से इस पर मतदान कर इसे नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किया। उस समय भी डॉ अंबेडकर जैसे विद्वान समान नागरिक संहिता को मौलिक अधिकारों में सम्मिलित करने के पक्ष में थे।
