- 30 हजार की मदद से शुरू किया सफर
- अब दूध बेचकर हर महीने कमा रहीं 8 हजार
गोपेश्वर (चमोली)। पहाड़ के गांवों में महिलाओं के लिए पशुपालन सिर्फ घर चलाने का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की नई राह भी बन रहा है। चमोली जिले के कर्णप्रयाग ब्लॉक के नैनी गांव की कमला भंडारी ने सरकारी परियोजना से मिली 30 हजार रुपये की सहायता और अपनी मेहनत के बूते दुग्ध व्यवसाय को आय का मजबूत जरिया बना लिया है। आज वह रोजाना छह से सात लीटर दूध बेचकर हर महीने करीब सात से आठ हजार रुपये कमा रही हैं।
कमला भंडारी नंदा स्वायत्त सहकारिता नौटी से संबद्ध राजराजेश्वरी स्वयं सहायता समूह की सक्रिय सदस्य हैं। वित्तीय वर्ष 2024-25 में उन्हें आईफेड वित्तपोषित रीप ग्रामोत्थान परियोजना के तहत व्यक्तिगत उद्यम के लिए 30 हजार रुपये की वित्तीय सहायता मिली। कमला ने इस मदद को अपने पारंपरिक पशुपालन से जोड़ा और दुग्ध उत्पादन एवं बिक्री का काम आगे बढ़ाया। पहले पशुपालन परिवार की जरूरतों तक सीमित था, लेकिन परियोजना के सहयोग के बाद कमला ने इसे व्यवस्थित व्यवसाय का रूप दिया। दूध की बिक्री से अब उन्हें नियमित मासिक आमदनी हो रही है। रोजाना छह से सात लीटर दूध की बिक्री उनके लिए आर्थिक सहारा बन गई है।
छोटे सहयोग ने बढ़ाया हौसला
कमला की कहानी गांव की उन महिलाओं के लिए भी मिसाल है, जो सीमित संसाधनों के कारण अपने काम को बड़े स्तर पर नहीं ले जा पातीं। परियोजना से मिली सहायता ने उन्हें पूंजी दी, लेकिन उसे आय में बदलने का काम उनकी मेहनत और लगन ने किया। दुग्ध व्यवसाय से होने वाली नियमित आमदनी से परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिली है। साथ ही कमला ने यह साबित किया है कि पहाड़ में रहकर भी पारंपरिक आजीविका को व्यवस्थित कारोबार में बदलकर महिलाएं अपनी आय का स्थायी स्रोत बना सकती हैं।
गांव की दूसरी महिलाओं को भी प्रेरणा
कमला की सफलता स्वयं सहायता समूह से जुड़ी दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रोत्साहन बन रही है। उनका अनुभव बताता है कि छोटे स्तर पर शुरू किया गया काम भी सही सहयोग, मेहनत और बाजार से जुड़ाव मिलने पर परिवार की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है। दुग्ध व्यवसाय अब कमला के लिए केवल पशुपालन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक आय का आधार बन चुका है।
