posted on : August 16, 2025 7:10 pm

गोपेश्वर (चमोली)। नंदा सिद्धपीठ कुरूड से नंदादेवी की उत्सव डोलियां कैलाश को रवाना हो गई है।

शनिवार को नंदा सिद्धपीठ कुरूड मंदिर में पूजा अर्चना के पश्चात देव डोलियों की कैलाश भावपूर्ण विदाई की गई। इसके तहत बधाण की नंदा की उत्सव डोली कुरूड से रवाना होकर रात्रि को चरबंग गांव पहुंच गई है। इस दौरान ग्रामीणों ने पुष्प वर्षा के साथ आगवानी की। रविवार को डोली मथकोट गांव के प्रवास पर रहेगी। दशोली की नंदा की उत्सव डोली कुरूड से प्रस्थान कर रात्रि प्रवास के लिए फरखेत गांव पहुंच गई है। इस दौरान ग्रामीण नंदादेवी पौराणिक जागरण में जुट गए है। रात भर यह अखंड जागरण चलता रहेगा। रविवार को देव डोली रात्रि प्रवास को जाखणी गांव पहुंचेगी। इस दौरान सृष्टि की उत्पति के जागर से पूरा गांव भक्तिरस में डुब गया है। कुरूड से चली बंड पट्टी की छंतोली भी मैठाणा, चमोली, क्षेत्रपाल, बिरही होते हुए रात्रि प्रवास के लिए बाटुला गांव पहुंची तो ग्रामीणों छंतौली को हाथों हाथ लिया। रविवार को छंतोली दिगोली गांव के प्रवास पर रहेगी।

कुरूड मंदिर से देवडोलियों और छंतोली की कैलाश विदाई के मौके पर तमाम लोगों की आंखे छलछला उठी। लोगों ने मां नंदा की लोकजात यात्रा की कुशलता की कामना करते हुए अपनी अराध्या को सौगात भेंट का भावपूर्ण विदाई दी। इस दौरान देव डोलियां आपस में भेंटा भेंटी करती रही। यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। इससे पूर्व तीन दिवसीय मेले का भी समापन हो गया है। इस अवसर पर बच्चों के सांस्कृतिक नृत्य पर लोग झूम उठे। आगामी अमुक्ता भरणी के अवसर पर नंदा देवी बेदनी बुग्याल पहुंचेगी तो इसी दिन यानी 30 अगस्त को दशोली की देव डोली बालपाटा में श्राद्ध तर्पण में प्रतिभाग करेगी। बंडपट्टी की छंतोली नैरूली थान में नंदा सप्तमी की जात में प्रतिभाग कर वापस सिद्धपीठ करूड पहुंच जाएगी। दशोली नंदा की उत्सव डोली बालपाटा में नंदा सप्तमी के बाद रात्रि प्रवास को रामणी आएगी और 31 अगस्त को कुमजुक प्रवास के बाद पहली सितंबर को कुरूड मंदिर में विराजमान होगी। बधाण की उत्सव डोली 30 अगस्त को बेदनी बुग्याल से वापस लौट कर बांक गांव के प्रवास पर रहेगी। 6 सितम्बर को देव डोली देवराडा मंदिर पहुंचकर 6 माह प्रवास के तहत मंदिर में विराजमान होगी। नंदा सिद्धपीठ कुरूड के अध्यक्ष सुखवीर रौतेला ने बताया कि विभिन्न पडाव से होते हुए देव डोलियां कैलाश को रवाना हो चली है। इसके चलते लोकजात यात्रा के प्रारंभ होने से पूरे इलाके नंदामय हो चले है।

 

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